सोच और बात

कभी काँच के उस पार
कभी डाइयफ्रॅम के दूसरे छ्होर पे
एक आवाज़, एक पेनटिंग बन गये हो तुम

चाहे जितनी कोशिश कर लूँ,
छू नहीं सकता
बात तो कर सकता हूँ
पर जानता हूँ की तुम्हे नहीं देख रहा हूँ

तुम मुझे देखते हो
तो भी यही लगता है की मुझे नहीं कहीं और देख रहे हो

कंप्यूटर और मोबाइल जैसे बीचोलिए बन गये हैं
कभी युहीं बैठे बैठे तुम कुछ कह देते हो
शायद बोरियत में
या तरस खा के
मैं जवाब दे देता हूँ
ये सोच के की कहीं बुरा ना लग जाए
वापस जवाब के बस इंतेज़ार में बैठा रहता हूँ
फिर यह सोचता हूँ की जब बात नहीं करनी थी
तो बात शुरू ही क्यूँ की?